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कपास की उपज बढ़ाने के लिए अध्ययन की जरूरत

आम लोगों के बीच यही धारण है कि भारत में 20 वर्ष पहले जीएम कपास की शुरुआत होने के बाद से कपास उत्पादन में वृद्धि हुई है।

यह बिल्कुल सच है कि जीएम कपास की शुरुआत होने के बाद से कपास उत्पादन बढ़ा है। लेकिन, इस वृद्धि में अधिक पैदावार से ज्यादा क्षेत्रफल विस्तार का योगदान है।

यहां कुछ तथ्यों को जानना ज़रूरी है।

तथ्य 1:भारत में जीएम कपास की शुरुआत होने के बाद (2002-2022) की तुलना में शुरुआत होने से पहले (1981-2001) कपास उपज की वृद्धि दर20% अधिक थी। सीएजीआर के हिसाब से भी देखें, तो इस दर में गिरावट आई है।

स्रोतः इंडेक्स मंडी (7 दिसंबर 2022 को देखे गए आंकड़े)

तथ्य 2:क्या यह कहा जा सकता है कि भारतीय जीएम कपास की उपज कम हुई है क्योंकि कपास उत्पादकता सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी थी? इसका जवाब है नहीं! भारत की जीएम कपास पैदावार अपने सर्वोच्च स्तर से काफी दूर है। दरअसल, म्यांमार जैसे एक छोटे देश ने भी जीएम कपास उपज के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया है।

स्रोतः इंडेक्स मंडी (7 दिसंबर 2022 को देखे गए आंकड़े)

भारत और म्यांमार, दोनों देशों ने 2002 में लगभग एक ही समय जीएम कपास की शुरुआत की थी। यहां फर्क सिर्फ इतना है कि भारत ने जीएम कपास हाइब्रिड की शुरुआत की, जबकि म्यांमार ने जीएम कपास की विभिन्न किस्मों को अपनाया।

भारत में 2002 से 2022 के बीच जीएम कपास की उपज में 53% वृद्धि हुई है। इसी अवधि के दौरान, म्यांमार में जीएम कपास की उपाज में 258% की भारी-भरकम बढ़ोत्तरी हुई है।

वैश्विक कपास उत्पादन में चीन और ऑस्ट्रेलिया 2000 किलो प्रति हेक्टेयर की उपज के साथ सबसे आगे हैं। यह मात्रा भारत में होने वाली उपज से 5 गुना अधिक है। इसलिए, हम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते कि भारत में जीएम कपास पैदावार अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई है।

तथ्य 3: भारत में जीएम कपास उत्पादन प्रमुख रूप से क्षेत्रफल विस्तार पर निर्भर है।

स्रोतः इंडेक्स मंडी (7 दिसंबर 2022 को देखे गए आंकड़े)

सवालः भारत में जीएम कपास उपज में गिरावट का क्या कारण है?

भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां जीएम कपास की विभिन्न किस्मों के बिना सिर्फ और सिर्फ जीएम कपास के हाइब्रिड बीज इस्तेमाल किये जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में जीएम कपास की उपज में लगातार होने वाली गिरावट का यही मुख्य कारण है।

वैरायटीयानि प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाला एक अनुवांशिक प्रकार। जबकि हाइब्रिड दो किस्मों के बीच क्रॉस होता है। ध्यानपूर्वक चुनी गई “वैरायटी”सूखी जमीनों पर अच्छे परिणाम देती हैं, और सूखा ग्रस्त परिस्थितियों में भी इनका प्रदर्शन ठीक होता है। वहीं, हाइब्रिड किस्म केवल सिंचाई वाली जमीनों पर अच्छे परिणाम देती हैं।

केवल हाइब्रिड किस्म में बीटी तकनीक को अपनाना एक बड़ी गलती थी और इसके कारण ही पैदावार बढ़ने से रुक गई और उनमें तीव्र प्रतिरोध विकसित होने लगा। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां बीटी (बैसिलस थुरियनजीनिसस) जीन को हाइब्रिड में शामिल किया गया है। चीन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में इसकी शुरुआत हाइब्रिड की बजाय कपास की वैरायटी में की गई है।

–         विशेषज्ञों के अनुसार बीटी तकनीक वैरायटी में होनी चाहिए, हाइब्रिड में नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया, 9 मार्च 2016

भारत में वर्षा आधारितखेती में उपज बढ़ने पर ही कपास उत्पादन बढ़ेगा, जिसके लिए बीटी कपास की वैरायटी विकसित करके उनका इस्तेमाल करना होगा।

–    वर्षा आधारित खेती में कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए बीटी वैरायटी का इस्तेमाल, डॉ. एच. बी. संतोष, वैज्ञानिक (पौध प्रजनन)

अगर भारत में म्यांमार के बराबर कपास की उपज होने लगे तो कपास उगाने में इस्तेमाल होने वाला क्षेत्रफल 25-30% तक कम किया जा सकता है। हम इस भूमि का इस्तेमाल अन्य फसलें उगाने के लिए कर सकते हैं, खासकर तिलहन उगाया जा सकता है, जिससे हमारा आयात बोझ भी कम होगा। 

भारत में जीएम हाइब्रिड कपास के खराब प्रदर्शन के लिए स्थाई समाधान हासिल करने हेतु विशेषज्ञों द्वारा जांच कराए जाने की आवश्यकता है।

भारत में जीएम तकनीक की सफलता के लिए हाइब्रिड और वैरायटी, दोनों के समावेश की ज़रूरत होगी। इसलिए, भारत में जीएम सरसों की शुरुआत करने से पहले सरकार को सबसे पहले जीएम कपास की समस्या का अध्ययन करके उसका समाधान करना चाहिए।

अगर भारत के जीएम कपास की उपज को सीमित करने वाली समस्या को बिना समझे और बिना हल किए जीएम सरसों की शुरुआत की जाती है, तो हमारे सामने दोहरी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।

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