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एनएलआर इंडिया फाउंडेशन की परामर्श एवं फॉलो-अप परियोजना

एनएलआर इंडिया फाउंडेशन ने एक कॉल सेंटर के माध्यम से कुष्ट रोग (लेप्रोसी) के उपचार प्राप्त कर रहे लोगों को परामर्श एवं फॉलो-अप के लिए एक परियोजना का कार्यान्वयन किया। इसके लिए एक समर्पित एवं प्रशिक्षित काउंसलर की भर्ती की गई और मामलों का फॉलो अप पाक्षिक आधार (हर पंद्रह दिन) पर किया गया। कॉल सेंटर की स्थापना जयपुर, राजस्थान में की गई है |

एनएलआर इंडिया फाउंडेशन ने कुष्ट रोगियों के उपचार की अवधि के दौरान टेली – काउंसलिंग के माध्यम से उनके साथ फॉलो-अप करने की उपयोगिता दर्शाने के लिए इस परियोजना की संकल्पना की थी। काउंसलर (परामर्शदाता) रोगी को फ़ोन करता है, उनके साथ बात करता है, उनकी शारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती के बारे में जानकारी लेता है, यह पता करता है कि महीने की बाकी अवधि के लिए उनके पास पर्याप्त दवा है या नहीं, क्या उन्हें अतिरिक्त सहायता की जरूरत है, क्या वे अपनी देखभाल खुद कर रहे हैं या नहीं, कोई नए चिन्ह या  लक्षण तो नहीं हैं, या कोई लक्षण बिगड़ तो नहीं रहा है (दवा की प्रतिक्रिया जानने के लिए)। प्राप्त सूचनाओं को स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों / कर्मचारियों बता दिया जाता है ताकि वो आगे की कार्रवाई कर सकें और मरीज को सहायता उपलब्ध करा सकें। यह पाया गया कि इस तरह स्वास्थ्य विभाग द्वारा रोगी का फॉलो अप करना आसान है। यह व्यवस्था कोविड महामारी के दौरान और भी अधिक प्रासंगिक साबित हुई |

रोगियों को पहली बार उनकी तंदुरुस्ती और जरूरतों के बारे में पूछताछ करने के लिए टेलीफोन पर कॉल (और पाक्षिक रूप से फॉलो अप कॉल्स) प्राप्त हुए। अधिकांश समय में उनकी ज़रूरतों को भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा पूरा किया गया। 

एनएलआर देश के जिन सात राज्यों में काम करती है, राजस्थान उनमे से एक है। इस राज्य के कुष्ट रोग अधिकारी (एसएलओ) ने कॉल सेंटर के माध्यम से किये गए क्रियाकलाप के बारे में जानने के लिए व्यक्तिगत रुचि ली – जैसे कि, रोगियों का फॉलो-अप कैसे हो रहा है, फॉलो-अप की अवधि क्‍या थी, कितने फॉलो अप किए गए, रोगियों से किस प्रकार के प्रश्न पूछे गए, किस प्रकार का परामर्श दिया गया, रोगियों के फीडबैक क्या-क्या थे, और उन फीडबैक के आधार पर क्या-क्या कारवाई की जा सकती थी।

एनएलआर इंडिया फाउंडेशन के मैनेजिंग ट्रस्टी, डॉ. अशोक अग्रवाल ने इस उपलब्धि के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, “जब किसी कार्यक्रम को सरकार द्वारा अपना लिया जाता है तब इसकी संवहनीयता बढ़ जाती है। इस मामले मैं, परियोजना की सफलता सरकार को पूरे राज्य में इसे लागू करने में मदद कर सकती है।।”

एनएलआर इंडिया के नेशनल प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर , डॉ. प्रवीण कुमार ने कहा कि, “इस पायलट परियोजना ने दर्शाया है कि टेली-काउंसलिंग के माध्यम से फॉलो अप एक अच्छा विकल्प है क्योंकि इससे स्वास्थ्य विभाग को मरीज की स्थिति और जरूरतों की बेहद जरूरी जानकारी मिलती है। साझा किए गए सूचनाओं पर कार्रवाई होती है। इस से मरीजों का सरकार के स्वास्थ्य विभाग पर विश्वास बढ़ता है | यह ऐसा मॉडल है जिसे पूरे भारत में लागू किया जा सकता है।”