विश्व में हर दूसरे सेकेंड एक ब्रेन स्ट्रोक का मरीज सामने आ रहा है। भारत में ही हर साल लाखों स्ट्रोक के नए मरीज आ रहे हैं। हमेशा के लिए अपाहिज करने वाली यह बीमारी जागरूकता की कमी के कारण आज तेजी से बढ़ रही है। ब्लड प्रेशर, शुगर जैसी बीमारी और धूम्रपान इस बीमारी को बढ़ाने में सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रहे हैं। वर्ल्ड स्ट्रोक डे के मौके पर रुकमणी बिरला हॉस्पिटल के विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी। विशेषज्ञों ने स्ट्रोक के कारण व बचाव तथा अत्याधुनिक तकनीकों से इलाज की जानकारी दी।
स्ट्रोक के बाद प्रति मिनट मरती हैं 10 लाख कोशिकाएं –
न्यूरोसाइंसेज विभाग के डायरेक्टर डॉ. अंजनी कुमार शर्मा ने बताया कि, स्ट्रोक अब युवाओं में भी तेजी से बढ़ने वाली बीमारी हो गई है। देश में तो मरीज बढ़ ही रहे हैं। स्ट्रोक में ब्रेन की प्रति मिनट 10 लाख कोशिकाएं मर जाती हैं। स्ट्रोक या लकवे का इलाज समय पर नहीं होने पर मरीज हमेशा के लिए अपाहिज हो जाता है। इसीलिए 3 से साढ़े चार घंटे जिसे गोल्डन पीरियड कहा जाता है, उसमें इलाज जरूरी है। पिछले कुछ सालों में हमारे देश में स्ट्रोक के केस काफी बढ़े हैं। वहीं हार्ट की कुछ बीमारियां जैसे एट्रियल फिब्रिलेशन या अनियंत्रित ब्लड प्रेशर एवं शुगर भी स्ट्रोक के कारण हो सकते है । लक्षणों को पहचान कर समय पर इलाज लेने से गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है |
न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ पुष्कर गुप्ता ने बताया कि स्ट्रोक की पहचान चेहरा टेढ़ा हो जाना, आवाज बदल जाना, शरीर के एक हिस्से में कमजोरी के साथ ताकत कम हो जाना जैसे लक्षण प्रमुख है। लक्षणों को समझ कर तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। समय रहते यदि इलाज प्रारंभ कर दिया जाए तो स्ट्रोक को काबू में लाया जा सकता है। उम्र का बढ़ना स्ट्रोक का बड़ा कारण होता है। हर 10 साल में स्ट्रोक का खतरा भी 10 प्रतिशत बढ़ जाता है। इसके अलावा अनुवांशिक कारण, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, स्मोकिंग या तंबाकू का सेवन, शराब का सेवन भी स्ट्रोक का खतरा काफी बढ़ा देते हैं। खराब लाइफ स्टाइल के कारण भी युवाओं में स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
न्यूरो सर्जरी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अमित चक्रबर्ती ने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक भारत में रोगियों की मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण है। शुगर, बीपी मरीजों को खासतौर पर इस बीमारी में ध्यान रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में हर साल स्ट्रोक से दो करोड़ लोग पीड़ित होते हैं, इनमें से 50 लाख लोगों की मौत हो जाती है। इस बीमारी में इलाज में जितनी देरी होती है, उतना रिकवरी में नुकसान होता है। स्ट्रोक पड़ने पर दो प्रकार से इलाज किया जाता है। खून की नस बंद होने पर दिमाग में सूजन आ जाती है और वहां दबाव भी बढ़ जाता है जिससे मरीज की जान को खतरा हो जाता है। ऐसे में दबाव को कम करने के लिए खोपड़ी के आधे हिस्से की हड्डी को काटकर दबाव कम किया जाता है। इसके अलावा दूरबीन से सर्जरी कर थक्के को बाहर निकाल दिया जाता है।













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