बीएसई (BSE) और एनएसई (NSE) सूचीबद्ध, विकास लाइफकेयर लिमिटेड ने अनुसंधान इनपुट साझा करने और चावल की भूसी से सेलूलोज़, लिग्निन और सिलिका जैसी विभिन्न व्यवहार्य सामग्री विकसित करने पर काम करने के लिए तीन विश्व स्तरीय संस्थानों के साथ अपने सहयोग की घोषणा की है।
इस एग्रो-सर्कल प्रोजेक्ट में नई दिल्ली स्थित इस कंपनी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीएचयू)-वाराणसी और स्वीडन की स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी से हाथ मिलाया है।
इसके अलावा, कंपनी ने इसी उद्देश्य के लिए प्रसिद्ध स्वीडिश कंपनियों- लिग्नफ्लो टेक्नोलॉजीज़ एबी (Lignflow Technologies AB) और लिग्ज़िया कम्यूटर (Lixea Computer) के साथ भी साझेदारी की है।
कंपनी ने एक मीडिया विज्ञप्ति में कहा कि एग्रो-सर्कल प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य कृषि-औद्योगिक साइड-स्ट्रीम से सर्कुलर सामग्री के उत्पादन के लिए नवीन मूल्य श्रृंखला अवधारणाओं को स्थापित करना है।
इसमें ये भी जोड़ा गया कि “खेतों पर सीधे फसल अवशेषों को जलाने से होने वाले प्रदूषण से बचने के अलावा, जो कि सर्दियों के मौसम में भारत के उत्तरी भाग में खराब वायु गुणवत्ता का सबसे बड़ा कारण है, इस परियोजना का लक्ष्य इन कृषि अपशिष्ट पदार्थों से निकाले गए प्राकृतिक पॉलिमर, द्वारा नई जैव-आधारित सामग्री का उत्पादन करने के लिए तकनीक विकसित करना होगा।”
स्वीडन स्थित लिग्ज़िया कम्यूटर (Lixea Compular) का उद्देश्य लिग्ज़िया की डेंड्रिटिक प्रक्रिया का उपयोग करके कृषि चावल के अवशेषों से सेल्यूलोज़ के लिए उत्पादन प्रक्रिया स्थापित करना है।
दूसरी ओर,आईआईटी (बीएचयू)-वाराणसी के सहयोग के साथ लिग्नफ्लो टेक्नोलॉजीज़, एबी का उद्देश्य लिग्निन के उत्पादन को संरक्षण देना है। विकास लाइफकेयर चावल की भूसी से नैनो सिलिका का उत्पादन करने के लिए एक प्रौद्योगिकी विकसित करने में सहायक के रूप में कार्य करेगा।
स्टॉकहोम विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू)-वाराणसी लिग्नोसेल्यूलोज़ अंशों के लक्षण वर्णन के माध्यम से योगदान देगा। इसके अलावा, आईआईटी (IIT)-वाराणसी, स्टॉकहोम विश्वविद्यालय और बायो-नैनो नए जैव-आधारित कार्यात्मक सेल्युलोसिक फाइबर डिज़ाइन करेंगे।
विकास लाइफकेयर के प्रबंध निदेशक और एक प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. एसके धवन ने विकास पर टिप्पणी करते हुए कहा, “इस सहयोग का उद्देश्य उत्पादन, पुनर्प्राप्ति, पुन: उपयोग और उत्पाद को उसके मूल में वापस भेजने के माध्यम से स्थिरता प्राप्त करना तथा एक परिपत्र अर्थव्यवस्था विकसित करना है, जो इसके जीवन के अंत में बनता है, जिसके परिणामस्वरूप शून्य या नगण्य अपशिष्ट प्राप्त होता है”।
उन्होंने आगे कहा, “लगभग 20 वर्षों में मानव आबादी 9 अरब से अधिक हो जाएगी, और अकेले भारतीय आबादी आज 1.4 अरब है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन दुनिया-भर के समुदायों के लिए गंभीर खतरे का कारण बना हुआ है, जिससे मानव जाति को कृषि उत्पादन के विस्तार की तत्काल आवश्यकता है। चावल के भूसे और भूसी जैसे कृषि उप-उत्पादों की बढ़ती जनरेशन होगी, जो नवीकरणीय, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध और टिकाऊ हैं।”
विकास लाइफकेयर की आरएंडडी (R&D) टीम ने सफलतापूर्वक अवधारणा का प्रमाण प्राप्त किया, जबकि उन्होंने इलेक्ट्रोड सामग्री के रूप में ग्रेफीन के साथ सम्मिश्रण के लिए सिलिकॉन बनाने और प्लास्टिक के साथ पैलेट बनाने सहित श्रेष्ठ अनुप्रयोगों के लिए चावल की भूसी से नैनो सिलिका बनाने के लिए आशा अनुरूप परिणाम स्थापित किए।
कंपनी इस ‘एग्रो साइकिल प्रोजेक्ट’ से विकास लाइफकेयर द्वारा पेश किए गए वाणिज्यिक नंबरों में महत्वपूर्ण योगदान की उम्मीद कर रही है।
विकास लाइफकेयर प्लास्टिक, सिंथेटिक और प्राकृतिक रबर के लिए पॉलिमर और रबर यौगिकों और विशेष एडिटिव्स के निर्माण के व्यवसाय में लगी हुई है।
कंपनी पारंपरिक रूप से पॉलीमर और रबर कमोडिटी कंपाउंड्स और मास्टर-बैचेस सहित विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में लगी हुई है।
विकास लाइफकेयर ने औद्योगिक अनुप्रयोग के लिए पैलेट और इंटरलॉकिंग टाइल बनाने के लिए अपशिष्ट प्लास्टिक के पुनर्चक्रण पर विकास लाइफकेयर टीम द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी के लिए पेटेंट का अंतिम अनुदान भी प्राप्त किया है।












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