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हार्ट फेल के जटिल मामलों में तेजी

जिन लोगों में हार्ट फेल होने संबंधी समस्या होती है, उनमें देखभाल के मौजूदा मानकों के हिसाब से उपचार होने के बाद भी हार्ट फेल की स्थिति के खराब होने का खतरा होता है। हार्ट फेल की जटिल स्थितियों के मामलों में, हार्ट फेल के लक्षण उस स्तर तक पहुंच जाते हैं जब गंभीर किस्‍म की जटिलताएं बढ़ जाती हैं और मरीज़ को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत होती है या उनके उपचार पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत होती है। इससे प्रभावित मरीज़ों को अक्सर बार-बार अस्पताल में भर्ती होने के जाल में फंसना पड़ता है और इसके अलावा ऐसे मरीज़ों में मृत्यु का खतरा भी बढ़ जाता है। वैश्विक आंकड़ों से पता चलता है कि उचित देखभाल के बावजूद, हार्ट फेल होने का पता चलने के 18 महीनों के भीतर 6 में से 1 मरीज़ को हार्ट फेल की गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता है।

हार्ट फेल से जुड़े मौजूदा अमेरिकी और यूरोपीय दिशा-निर्देशों में हार्ट फेल के गंभीर मामलों को अलग श्रेणी में रख दिया है। इन दिशा-निर्देशों के मुताबिक, ऐसे मरीज़ों में कार्डियोवैस्क्यूलर बीमारियों की वजह से होने वाली मौतों और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को कम करने के लिए हार्ट फेल के लिए चल रही स्टैंडर्ड थेरेपी के साथ-साथ अतिरिक्त थेरेपी भी दी जानी चाहिए।

डॉ. संजीव कुमार शर्मा, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, एटर्नल हॉस्पिटल (ईएचसीसी) ने कहा, “हार्ट फेल इस समय देश में चिंता की प्रमुख वजह बनी हुई है क्योंकि ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। जयपुर में अब हार्ट फेल के मरीज़ों की देखभाल पहले के मुकाबले बेहतर ढंग से हो पाती है क्योंकि डॉक्टर दिशा-निर्देशों के हिसाब से मेडिकल थेरेपी का इस्तेमाल करते हैं। हार्ट फेल के मामलों के लिए नए उपचार सामने आ रहे हैं जो काफी प्रभावी हैं और इन्हें दिशा-निर्देशों में शामिल किया जा सकता है। क्लिनिकल ट्रायल्स से पता चला है कि इन प्रयासों से हृदय के काम करने की प्रक्रिया और वैस्क्यूलर टोन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है जिससे कार्डिएक आउटपुट में सुधार करने में मदद मिलती है। इसे स्टैंडर्ड थेरेपी का हिस्सा बनाने के बाद, गंभीर हार्ट फेल के मरीज़ों को बार-बार अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु के जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।”

फिलहाल, भारत में 80 लाख से 1 करोड़ लोग हार्ट फेल की समस्या का सामना कर रहे हैं। भारत में ऐसे मरीज़ों की औसत उम्र 50 से 60 वर्ष है, जबकि पश्चिमी देशों में यह उम्र 60 से 70 वर्ष है। अस्पताल में भर्ती होने के दौरान मरने वाले मरीज़ों की संख्या भी भारत में अपेक्षाकृत रूप से ज़्यादा है। अस्पताल में मरने वालों की संख्या भी 10 से 30.8 फीसदी है जो पश्चिमी देशों में 4 से 7 फीसदी है। डिस्चार्ज के बाद होने वाली मृत्यु की दर 26 फीसदी है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में भी हार्ट फेल और हार्ट फेल के गंभीर मामलों के बीच अंतर होना चाहिए और ऐसे गंभीर मामलों से पीड़ित लोगों का उपचार उभरती हुई नई थेरेपी की मदद से किया जाना चाहिए। 

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