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राजस्थान की बिजली व्यवस्था को नए ट्रांसमिशन मॉडल की दरकार

राजस्थान में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं राज्य तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) का बड़ा केंद्र भी बन रहा है। ऐसे में ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते राज्य के ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यही बिजली व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञ अब पारंपरिक 132/33 केवी प्रणाली की जगह आधुनिक 220/33 केवी ट्रांसमिशन मॉडल अपनाने की वकालत कर रहे हैं, जिससे बिजली की हानि कम होगी, आपूर्ति अधिक भरोसेमंद बनेगी और भविष्य की बढ़ती मांग को आसानी से पूरा किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ अब उस नेटवर्क को भी मजबूत करना जरूरी है, जो बिजली उत्पादन केंद्रों से उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाता है।

आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन लॉस वर्ष 2019-20 में 3.33 प्रतिशत था, जो हाल के वर्षों में बढ़कर 4.25 से 4.38 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह उत्तरी क्षेत्र के औसत 3.34 प्रतिशत से काफी अधिक है। इसी अवधि में राज्य की अधिकतम बिजली मांग 14,277 मेगावाट से बढ़कर 19,165 मेगावाट हो गई, जबकि वार्षिक बिजली खरीद 82.36 अरब यूनिट से बढ़कर 117.70 अरब यूनिट पहुंच गई।

ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि ट्रांसमिशन लॉस में 0.1 प्रतिशत की भी वृद्धि होने पर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर लगभग 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ सद्दाफ आलम का कहना है कि ट्रांसमिशन लॉस पूरी तरह तकनीकी नुकसान होता है और यह नेटवर्क की क्षमता पर निर्भर करता है। ट्रांसमिशन लॉस इस बात का संकेत है कि मौजूदा नेटवर्क पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है।

अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2031-32 तक राजस्थान की अधिकतम बिजली मांग लगभग 30,000 मेगावाट तक पहुंच सकती है, जबकि वार्षिक बिजली आवश्यकता करीब 180 अरब यूनिट हो जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौजूदा 132 केवी और 220 केवी प्रणाली पर ही विस्तार किया गया तो नए सब-स्टेशन, ट्रांसमिशन लाइन और कॉरिडोर बनाने में अधिक लागत, जमीन अधिग्रहण की कठिनाइयों और परियोजनाओं में देरी जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।

ऊर्जा विशेषज्ञ राजीव सिंह ने बताया कि आज सबसे बड़ी चुनौती बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि उसे बिना नुकसान के उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है। यदि मौजूदा व्यवस्था में केवल थोड़ा-थोड़ा विस्तार किया गया, तो आने वाले वर्षों में ट्रांसमिशन नेटवर्क पर भारी दबाव और तकनीकी नुकसान दोनों बढ़ेंगे। इसी कारण भविष्य की परियोजनाओं में 220/33 केवी ट्रांसमिशन मॉडल अपनाना जरूरी है। 

विशेषज्ञों के अनुसार इस मॉडल से ट्रांसमिशन लॉस में करीब 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है, परियोजनाओं की कुल लागत लगभग 10 प्रतिशत घट सकती है और कम संख्या में ट्रांसमिशन लाइन तथा सब-स्टेशन बनाने की जरूरत पड़ेगी।

एक अन्‍य ऊर्जा विशेषज्ञ का कहना है कि 220/33 केवी मॉडल केवल तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि राजस्थान की भविष्य की बिजली जरूरतों के लिए एक रणनीतिक आवश्यकता है। उच्च वोल्टेज प्रणाली अधिक बिजली को कम नुकसान के साथ पहुंचाती है, नेटवर्क की विश्वसनीयता बढ़ाती है और भूमि अधिग्रहण जैसी चुनौतियों को भी कम करती है। विशेषज्ञों ने मौजूदा नेटवर्क को और बेहतर बनाने के लिए कंडक्टर बंडलिंग, रिएक्टिव पावर मैनेजमेंट, डिस्कॉम के पावर फैक्टर में सुधार और जरूरत वाले क्षेत्रों में एचटीएलएस (HTLS) कंडक्टर के उपयोग जैसे सुझाव भी दिए हैं।

यदि राजस्थान को देश की अग्रणी नवीकरणीय ऊर्जा शक्ति बनना है, तो केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क का समय पर आधुनिकीकरण भी जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर बढ़ता ट्रांसमिशन लॉस डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति और राज्य के ऊर्जा परिवर्तन अभियान, दोनों पर असर डाल सकता है।

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