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रिटायरमेंट की तैयारी में भारत पीछे, सीखने की जरूरत

हम अब पहले से अधिक आयु तक जी रहे हैं। पूरी दुनिया में, और विशेष रूप से भारत में, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, ज्यादा स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने औसत आयु को लगातार बढ़ाया है। निश्चित तौर परयहआधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और सार्वजनिक नीतियों की एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन लंबी उम्र (दीर्घायु) अपने साथ एक बेहद व्यक्तिगत और गंभीर चुनौती भी लेकर आई है, जिसे अर्थशास्त्री और वित्तीय योजनाकार ‘दीर्घायु का विरोधाभास’ (लॉन्जेविटी पैराडॉक्स)कहते हैं।

अनुराग गुप्ता, चीफ बिज़नेस ऑफिसर, पार्टनरशिप चॅनेल्स एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस  लिमिटेड के अनुसार, यह चुनौती कितनी गंभीर है, इसे एक्सिस मैक्स लाइफ इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी (आइरिस 5.0) के पांचवें संस्करण से मिले नतीजे और भी स्पष्ट करते हैं। कांतार के सहयोग से किए गए इस अध्ययन के अनुसार, भारत का राष्ट्रीय रिटायरमेंट रेडीनेस स्कोर 100 में से केवल 48 है। पिछले वर्षों की तुलना में इसमें थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिनअब भी रिटायरमेंट की तैयारी के मामले में देश काफी पीछे है। इस औसत आंकड़े के पीछे आर्थिक रूप से अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहे शहरी भारतीयों की गहरी चिंताएं छिपी हैं।

जरा उन माता-पिता के बारे में सोचिए जिनके बच्चे पढ़ाई या नौकरी के लिए घर छोड़ चुके हैं और जो अब रिटायरमेंट के बेहद करीब हैं। ऐसे लोगों को एम्प्टी नेस्टर्स की संज्ञा दी गई है। आइरिस 5.0 सर्वे में एक चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आया है। इस वर्ग के 86प्रतिशत लोगों को ठीक-ठीक पता है कि अपनी वर्तमान जीवनशैली बनाए रखने के लिए उन्हें कितने पैसों की जरूरत होगी। यानी उन्होंने पूरा हिसाब लगा लिया है। इसके बावजूद केवल 33प्रतिशत लोगों को ही इस बात का भरोसा है कि उनकी बचत रिटायरमेंट के बाद 10 साल से ज्यादा चल पाएगी। जरूरत के बारे में जागरूकता और वास्तविक तैयारी के बीच यह बड़ा अंतर दिखाता है कि जानकारी होने के बावजूद लोग उसे व्यवहार में बदल नहीं पा रहे हैं।

इस बारे में जागरूकता तो है, लेकिन अब लोगों को अपनी निष्क्रियता तोड़नी होगी। फिलहाल 24प्रतिशत शहरी भारतीय मानते हैं कि उन्होंने अपने रिटायरमेंट के लिए बचत की दिशा में अब तक कोई कदम ही नहीं बढ़ाया है। अगर कोई व्यक्ति 40 या 50 की उम्र तक बचत शुरू करने का इंतजार करता है, तो उसके सामने विकल्प काफी सीमित हो जाते हैं। फिर उसे या तो बहुत जोखिम भरे निवेश (हाई रिस्क इन्वेस्टमेंट) करने पड़ते हैं या रिटायरमेंट के बाद अपनी जीवनशैली में बड़ा समझौता करना पड़ता है।

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