भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था अब पारंपरिक केंद्रों की सीमाओं को पार कर रही है। आज के दौर में वैश्विक विकास कोई अकेली यात्रा नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रयास है। इसी विजन के साथ पेग्लोकल ने ‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ (The Borderless Collective) नामक एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। जिसे वैश्विक व्यापार को शक्ति प्रदान करने वाले विभिन्न स्तरों को एक साथ लाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस पहल का उद्देश्य भुगतान (Payments), लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग, अनुपालन (Compliance) और ई-कॉमर्स जैसे निर्यात के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को एक साझा मंच पर लाना है।
इसी क्रम में ‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ का जयपुर संस्करण आयोजित किया गया और इसे ‘सीज़न 1 जयपुर एक्सपोर्ट बैठक’ नाम दिया गया। इस मिशन में पेग्लोकल के साथ कई प्रमुख भागीदार शामिल हुए। इनमें एक्सपोर्टेल (Xportel), ल्यूक्रिया कंसल्ट (Lucria Consult), डीएमएसमैट्रिक्स (DMSMatrix) और एक्सिस बैंक प्रमुख हैं। ये सभी भागीदार लॉजिस्टिक्स, अनुपालन, ई-कॉमर्स और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं। जब ये सिस्टम एक साथ काम करते हैं, तो वैश्विक विकास को नई गति मिलती है। इस बैठक में स्थानीय निर्यातकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह भागीदारी क्षेत्र के व्यवसायों की बढ़ती महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। यह उनकी बदलती जरूरतों का भी एक स्पष्ट संकेत है।
इस पहल पर बात करते हुए, पेग्लोकल की को-फाउंडर और सीईओ प्राची धरानी ने कहा, “वैश्विक स्तर पर व्यापार करना सिर्फ खरीदार ढूंढने तक सीमित नहीं है। निर्यातकों को कई बिखरे हुए सिस्टम्स से जूझना पड़ता है। इनमें अनुपालन, लॉजिस्टिक्स, भुगतान और बैंकिंग शामिल हैं। ये चुनौतियां सीधे उनके विस्तार को प्रभावित करती हैं। पेग्लोकल में हम इन समस्याओं को गहराई से समझते हैं।‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ हमारा एक विशेष प्रयास है। इसका लक्ष्य पूरे इकोसिस्टम को एक साथ लाना है। इससे निर्यातक सही साझेदारों और इंफ्रास्ट्रक्चर तक आसानी से पहुंच सकेंगे। यह उन्हें वैश्विक स्तर पर बढ़ने में मदद करेगा। भुगतान के मामले में, पेग्लोकल निर्यातकों को बेहतरीन सुविधाएं देता है। हम सहज क्रॉस-बॉर्डर कलेक्शन और तेज सेटलमेंट प्रदान करते हैं। साथ ही, पारदर्शी रीकंसिलिएशन और इन-बिल्ट अनुपालन कंप्लायंस का समर्थन भी मिलता है। हमारा लक्ष्य है कि भुगतान अब कोई बाधा न बने। बल्कि, यह वैश्विक विकास का एक मजबूत जरिया साबित हो।”
जयपुर आज एक प्रमुख निर्यात क्लस्टर के रूप में उभर रहा है। हस्तशिल्प, टेक्सटाइल, ज्वेलरी और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स में इसकी मजबूत पकड़ है। वैश्विक स्तर पर भी जयपुर की पहुंच लगातार बढ़ रही है। हालांकि बाजार में मांग तो बढ़ रही है, लेकिन निर्यातकों के सामने कई चुनौतियां हैं जिसमे उन्हें अक्सर भुगतान, शिपिंग और अनुपालन जैसी बिखरी हुई प्रक्रियाओं से जूझना पड़ता है। वित्तीय सिस्टम्स की जटिलता भी एक बड़ी बाधा है।
‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ इसी अंतर को दूर करने का प्रयास करता है। यह निर्यातकों को शुरू से अंत तक (End-to-End) समर्थन देने के लिए एक इकोसिस्टम बनाता है। निर्यात प्रक्रिया के हर चरण में विशेष विशेषज्ञता की जरूरत होती है। इसमें अंतरराष्ट्रीय भुगतान, लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट और बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। इन सभी का एक साथ मिलकर काम करना बहुत आवश्यक है।
इस पहल के तहत कलेक्टिव ने जयपुर के निर्यात इकोसिस्टम पर एक रिपोर्ट पेश की। इसमें दिखाया गया है कि भारत का यह स्थापित निर्यात केंद्र किस तरह बदल रहा है। विश्लेषण के अनुसार, जयपुर का उत्पादन स्तर बहुत मजबूत है। लेकिन उत्पादन के बाद के चरणों में चुनौतियां बढ़ रही हैं। अब सामान के लॉजिस्टिक्स पर दबाव बढ़ रहा है। वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाना और मूल्य बढ़ाना भी अब एक चुनौती है। यह सब एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। विकास का अगला चरण इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि जयपुर क्या बनाता है। बल्कि, यह इस बात से तय होगा कि वह दुनिया की मांग से कितनी प्रभावी तरीके से जुड़ पाता है।
एक्सपोर्टेल के को-फाउंडर अंशुल महिंद्रू ने कहा, “आज के वैश्विक व्यापार में मजबूती केवल पैमाने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि व्यवसाय बदलती मांग के अनुसार अपने लॉजिस्टिक्स सिस्टम को कितनी तेजी से अनुकूलित कर सकते हैं। देरी, अक्षमताएं और सप्लाई चेन में पारदर्शिता की कमी विकास को काफी धीमा कर सकती है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह बन गई है कि ऐसे फुर्तीले लॉजिस्टिक्स नेटवर्क बनाए जाएं, जो गति, लागत-प्रभावशीलता और नियंत्रण बनाए रखें। यहीं से दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा तय हो रही है।”
ल्यूक्रिया कंसल्ट के फाउंडर और सीईओ सुमेध सचदेव ने कहा, “भारतीय निर्यातकों के सामने मांग की समस्या नहीं है, बल्कि सिस्टम की समस्या है। वर्षों से विकास रिश्तों और मैन्युअल प्रक्रियाओं के आधार पर हुआ है, लेकिन यह मॉडल वैश्विक स्तर पर स्केल नहीं कर सकता। निर्यात वृद्धि का अगला चरण उन व्यवसायों द्वारा संचालित होगा, जो अनुपालन, भुगतान और इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूत सिस्टम बनाते हैं। विजेता केवल अच्छे निर्माता नहीं होंगे, बल्कि सुव्यवस्थित वैश्विक ऑपरेटर होंगे। 2026 से 2030 के बीच वही कंपनियां आगे बढ़ेंगी, जो अनुपालन, भुगतान और इंफ्रास्ट्रक्चर के मजबूत क्रॉस-बॉर्डर सिस्टम बनाती हैं, न कि वे जो इन्हें केवल बैक-ऑफिस कार्य मानती हैं।”
डीएमएसमैट्रिक्स के सीईओ सुदीप सिंह ने कहा, “निर्यात में असफलता अक्सर उत्पाद या मांग की कमी से नहीं होती। इसकी असली वजह यह है कि उनसे जुड़े सिस्टम एक साथ काम नहीं करते। लॉजिस्टिक्स, भुगतान, अनुपालन, बैंकिंग और ई-कॉमर्स—इन सबको एक एकीकृत इकोसिस्टम के रूप में काम करना चाहिए। ‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ की सबसे बड़ी खूबी यही है। यह इस वास्तविकता को समझता है। यह इन सभी स्तरों को एक साथ लाता है। इससे वैश्विक विकास अधिक व्यवस्थित और बड़े स्तर पर संभव हो पाता है।”
जयपुर एक्सपोर्ट बैठक में सभी क्षेत्रों के दिग्गज एक साथ आए। चर्चा का मुख्य केंद्र यह था कि भारत से वैश्विक व्यवसाय कैसे बनाए जाएं। साथ ही, उनके विस्तार पर भी जोर दिया गया। ध्यान केवल विदेशी बाजारों तक पहुंचने पर नहीं था। बल्कि, एक ऐसा मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर था जो लंबे समय तक विकास को टिकाए रख सके। भारत के निर्यातक, विशेष रूप से एमएसएमई (MSMEs), देश के व्यापारिक सपनों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। हालांकि, उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए केवल अवसर काफी नहीं हैं। इसके लिए पूरे इकोसिस्टम में सही तालमेल की आवश्यकता है।
दरअसल, पेग्लोकल का उद्देश्य एक साझा प्लेटफॉर्म तैयार करना है। ‘द बॉर्डरलेस कलेक्टिव’ के माध्यम से सभी सिस्टम, साझेदार और नए विचार एक साथ आएंगे। इससे निर्यातक बिखरे हुए विकास की बाधाओं को पार कर सकेंगे। वे एक व्यवस्थित और बड़े स्तर पर वैश्विक विस्तार की ओर बढ़ सकेंगे।













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