राजस्थान के कई जिलों में कपास उत्पादक किसानों में हताशा की स्थिति है। वे गुजरात से लाये गये घटिया बीज का इस्तेमाल कर ठगे से महसूस कर रहे हैं। न तो उनकी फसल को पिंकवॉर्म से बचाया जा सका और न ही पैदावार वादे के अनुरूप हुई है।
गंगानगर जिले में किसानों ने खेतों में गुजरात बीटी 4 और 5 जी के रूप में कपास बीज की एक नई प्रजाति का इस्तेमाल किया था। प्रभावित किसानों का कहना है कि कपास के गुजरात बीटी 4 और 5 जी बीज को किसी भी अन्य किस्म की तुलना में अधिक पैदावार देने और पिंक बॉलवर्म को नियंत्रित करने के वादे के साथ हरियाणा के पड़ोसी राज्य राजस्थान में भी बेचा गया था, लेकिन सब कुछ उल्टा हो गया। इस बीज ने न केवल कॉटन लीफ कर्ल वायरस को बढ़ा दिया है, बल्कि इससे किसानों को भारी नुकसान भी हुआ है। कोई और किसान उनकी तरह किसी अवैध नेटवर्क के झांसे में आकर इस तरह के गलत बीज का इस्तेमाल नहीं करें, इसके लिए वे जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
गंगानगर के तारागढ़ गांव के जगजीत सिंह का कहना है कि खेतों में कॉटन के नरमा 4जी बीज लगाए थे। इसमें बहुत बीमारियां हो रही हैं। छह स्प्रे करने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा। गुजरात के घटिया बीज को ऊंचे दाम पर यह कह कर बेचा गया था कि यह बीज कपास की फसलों को गुलाबी बॉलवर्म से बचाएगा। अधिक पैदावार और कोई संक्रमण नहीं होने के वादे के झांसे में आकर किसानों ने प्रतिष्ठित ब्रांडों की जगह गुजरात के घटिया कपास बीज का इस्तेमाल किया और अब वे फंस गये हैं। अब वे किसानों से अपील कर रहे हैं कि गुजरात के कपास बीजों का उपयोग न करें।
इस संबंध में कृषि विश्वविद्यालय के एंटोमोलॉजिस्ट डॉ. विजय कुमार ने घटिया बीजों के प्रसार पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बीटी कपास की किस्मों के परीक्षण और सरकार को उनकी सिफारिश करने से पहले अच्छी तरह से नियमों के अनुसार परिभाषित करनी चाहिए। परीक्षण के उपरांत किसानों के लिए बीज का विज्ञापन करना ठीक होगा। श्री कुमार ने कहा कि उन्होंने प्रभावित किसानों के खेतों का दौरा भी किया है। उन्होंने कपास बीज के अवैध किस्म की फसलें देखी हैं, जिसमें पौधे अविकसित हैं और उन पर फूल नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को लालच या झांसे में नहीं आना चाहिए। बीज खरीदने से पहले हर स्तर पर परख करनी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार अवैध बीजी 4 और बीजी 5 की विभिन्न किस्में तेजी से फैल रही हैं और अब लगभग 5 लाख पैकेट की अनुमानित बिक्री के साथ पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कुल 40 लाख हेक्टेयर में अनुमानित 2 लाख एकड़ में बोई गई हैं। विशेषज्ञों को यह भी डर है कि ये संकर किस्में व्हाइटफ्लाई के लिए एक अतिसंवेदनशील स्रोत के रूप में कार्य करेंगी, जो कॉटन लीफ कर्ल वायरस के लिए एक रोगानुवाहक के रूप में कार्य करती है और उनके आसपास के अन्य कपास क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाती है।
नगौर के बिरलोका गांव के श्री सता राम भी कपास का घटिया बीज बुआई कर ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दुकानदार ने बीटी कॉटन 5 जी महंगे बीज देकर अच्छी पैदावार होने का वादा किया था। उनका कहना है कि किसान हमेशा अच्छे उन्नत बीज का उपयोग कर अपनी पैदावार बढ़ाना चाहता है, लेकिन थोड़े लालच में हम गलत बीजों के नेटवर्क में फंस गए। मैं अपने किसान भाइयों से आग्रह करता हूं कि वे गलत लोगों के चक्कर में नहीं पड़ें।
जोधपुर जिले के ग्राम नांदिया खुर्द के एक अन्य किसान धरमा राम ने अपने खेत में गुजरात की गलत बीटी किस्में लगाईं। उनका कहना है कि इन बीजों का न तो विकास हुआ और न ही फूल खिले। ये बीज हमें तबाह कर गए। किसान अधिक पीड़ा में हैं और अधिकारियों के साथ कोई शिकायत दर्ज करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि अवैध बीज खरीद किसी भी बीमा दावे या सरकार द्वारा शुरू किए गए मुआवजे के तहत कवर नहीं करता, किसी उपभोक्ता निवारण मंच में शिकायत भी नहीं हो सकता।
कपास किसानों का कहना है कि अवैध बीटी 4 और 5 जी किस्म की फसलें बिना फल वाली छोटी होती हैं और वे कॉटन लीफ कर्ल वायरस से पीड़ित होती हैं और इस कारण से खेत में फसल को किसानों को छोड़ देनी पड़ी या इसे नष्ट करना पड़ा और उसकी जगह पर किसानों ने धान लगा दिया। इसमें कई किसानों को नुकसान के साथ काफी परेशानी भी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार हमेशा किसानों की जरूरतों के प्रति बहुत संवेदनशील रही है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करनी चाहिए। यह समस्या और नहीं बढ़े, इसलिए ऐसे बीजों को अगले सीजन से बेचने की अनुमति न हो। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को पता है एक बीज को बाजार में बेचने की मंजूरी मिलने में कम-से-कम आठ साल लगते हैं। अवैध नेटवर्क सरकार ही नहीं, बल्कि सभी किसानों के लिए हानिकारक हैं। मानव निर्मित संकट के साथ प्रकृति की अनिश्चितता कपास उत्पादकों की समस्याओं को और बढ़ा देती है। पिछले दो वर्षों में कपास के उत्पादन में गिरावट देखी गई है और इससे कपड़ा उद्योग में चिंता पैदा हो गई है। कपड़ा उद्योग के दिग्गजों का मानना है कि इस तरह के खतरे केवल कपास किसानों और कपड़ा उद्योग की चुनौती ही बढ़ाते हैं।












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