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फोर्टिस ने लिम्फोमा के इलाज में बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन की अहम भूमिका बताई

लिम्फोमा, कैंसर का एक ग्रुप है जो लिम्फेटिक सिस्टम पर असर डालता है। लिम्फेटिक सिस्टम शरीर में रोगाणु के खिलाफ लड़ने वाला सिस्टम होता है। लिम्फोमा पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता बना हुआ है। इसके इलाज में बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन (बीएमटी) एक बहुत ही असरदार विकल्प के रूप में उभरा है। लिम्फोमा से ग्रसित मरीजों को बीएमटी ने उम्मीद की किरण दी है और उनकी रिकवरी में इससे क्रांति आई है।

लिम्फोसाइटों की असामान्य वृद्धि की वजह से लिम्फोमा होता है। लिम्फोसाइट्स इम्यून सिस्टम को बनाए रखने वाले वाइट ब्लड सेल्स का एक रूप होता है। हॉजकिन और नॉन हॉजकिन लिम्फोमा समेत इसके कई रूप होते हैं। अगर वक्त पर इलाज न किया जाए तो ये कैंसर जिंदगी के लिए खतरा हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनियाभर में सभी कैंसर मामलों में करीब 3% हिस्सेदारी लिम्फोमा की है।

फोर्टिस अस्पताल गुरुग्राम में हेमेटोलॉजी एंड बीएमटी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर डॉक्टर मीत कुमार ने बताया, ” लिम्फोमा के खिलाफ लड़ाई में बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन एक शक्तिशाली हथियार के रूप में उभरा है। बीएमटी में क्षतिग्रस्त या रोगग्रस्त बोन मैरो को हेल्दी मैरो से बदला जाता है. इसमें या तो मरीज का ही मैरो लिया जाता है या फिर किसी मैच डोनर का. पारंपरिक इलाजों की तुलना में इस प्रक्रिया से काफी लाभ मिलते हैं। जिन मामलों में कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी से पूरी तरह रिजल्ट नहीं आ पाते हैं, वहां बीएमटी का उपयोग किया जाता है। हेल्दी बोन मैरो को खराब से बदल दिया जाता है जिससे मरीज को फायदा मिलता है और उनके सर्वाइवल के चांस काफी अधिक हो जाते हैं।”

जिन मरीजों को रिलैप्स या रिफ्रैक्टरी लिम्फोमा की समस्या रहती है उनके लिए बीएमटी एक बेहतर विकल्प रहता है। इलाज को तेज करके और नई प्रतिरक्षा कोशिकाओं के जरिए, बीएमटी कैंसर कोशिकाओं लड़ने में मदद करता है। बीएमटी कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर अटैक करने के लिए प्रत्यारोपित प्रतिरक्षा कोशिकाओं की विशेषता का फायदा उठाता है। यह ग्राफ्ट-बनाम-लिम्फोमा प्रभाव अवशिष्ट कैंसर कोशिकाओं को मिटाने की शरीर की क्षमता को बढ़ाता है, रिलैप्स के जोखिम को कम करता है और मरीज के लिए इससे अच्छे रिजल्ट रहते हैं।

डॉक्टर मीत ने आगे कहा, ”बीएमटी के लिए उचित डोनर तलाशने के मामले में मेडिकल साइंस ने शानदार तरक्की की है। डोनर की कम्पैटिबिलिटी टेस्टिंग बेहतर हुई है, एचएलए मैचिंग और वैकल्पिक डोनर जैसे अम्बिलिकल कॉर्ड ब्लड जैसे विकल्प आसान हुए हैं जिससे ट्रांसप्लांट के चांस ज्यादा रहते हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के लिए उचित डोनर तलाशने में इससे मदद मिली है। मेडिकल तकनीक और इलाज के तरीकों में हुई तरक्की से बीएमटी बहुत ही सुरक्षित और ज्यादा असरदार प्रकिया बन गई है। इससे टॉक्सिसिटी कम हुई है, केयर बढ़ी है और मरीजों के लिए बेहतर रिजल्ट आए हैं, उनके जीवन में सुधार हुआ है।”

लिम्फोमा के इलाज में बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। धीरे-धीरे रिसर्च में नई चीजें आ रही हैं जिससे ये उम्मीद है कि बीएमटी के परिणामों में और सुधार की संभावना है। डॉक्टरों, रिसर्चर्स और स्वास्थ्य संगठनों के बीच सहयोग भी इस रोग से लड़ने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

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