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आधुनिक थेरेपी के नए विकल्पों से सोरायसिस मरीज़ों को राहत

वर्ष 2016 में अस्पतालों के हिसाब से किए गए प्रसार संबंधित अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत में 70 लाख से लेकर 4.3 करोड़ लोग सोरायसिस से पीड़ित हैं। आशंका यही है कि इन मरीज़ों की संख्या और भी बढ़ गई होगी। सोरायसिस के मरीज़ों के लिए, उपचार के लिहाज़ से पहली ज़रूरत यह होती है कि इससे उनकी त्वचा जल्दी से जल्दी साफ हो जाए। मरीज़ भी चाहते हैं कि जितने लंबे समय तक हो सके उनकी त्वचा साफ बनी रहे।

जयपुर के एक वरिष्ठ त्वचा विशेषज्ञ ने इस बारे में कहा, “मैं हर महीने सोरायसिस के करीब 40-50 मरीज़ों को देखता हूं, इनमें से कुछ लोगों की त्वचा पर धब्बे होते हैं और इनमें खुजली भी होती है, हालांकि सारे मरीज़ों में ऐसा नहीं देखने को मिलता है। मरीज़ उपचार की शुरुआत पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद के साथ करते हैं। हालांकि, बीमारी की गंभीर प्रकृति के बारे में उनसे बातचीत करना महत्वपूर्ण होता है। बायोलॉजिक्स जैसे उपचार के विकल्प आने वाले समय में अहम भूमिका निभाने वाले हैं क्योंकि ये विकल्प ज़्यादा असरदार हैं और इनका विपरीत असर भी बहुत ही कम है। मैं अपने मरीज़ों को सलाह देता हूं कि वे अपने उपचार की प्रक्रिया में सक्रिय तौर पर हिस्सा लें और अपने लिए सबसे उपयुक्त थेराप्यूटिक विकल्प के बारे में जानें। मरीज़ों को बीमारी को, उसकी प्रकृति को, और उसे ठीक करने के तरीकों के बारे में जानना चाहिए, ताकि वे अपने जीवन को बेहतर बना सकें।”

सोरायसिस, त्वचा की गंभीर प्रकार की ऑटो-इम्यून बीमारी है जिसमें लंबे समय तक जलन की वजह से त्वचा पर शुष्क, मोटे, उभरे हुए लाल चकत्ते पड़ जाते हैं जिसमें से लगातार सफेद परतें निकलती रहती हैं। त्वचा पर पड़ने वाले चकत्तों में लगातार खुजली होती है और कई बार दर्द भी होता है। खुजली और दर्द की वजह से मरीज़ों के लिए रोज़ाना पहने जाने वाले कपड़ों को बर्दाश्त करना भी मुश्किल हो जाता है। खुजली की वजह से नींद पर भी बुरा असर पड़ता है और इसकी वजह से 31 फीसदी मरीज़ों की उत्पादकता भी प्रभावित होती है। सोरायसिस से गंभीर रूप से प्रभावित लोगों में अवसाद की आशंका ज़्यादा होती है और उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति भी विकसित हो सकती है। सोरायसिस के करीब 7 से 42 फीसदी मरीज़ों में सोरायटिक ऑर्थराइटिस के लक्षण देखने को मिलते हैं जिसमें जोड़ों में बहुत दर्द होता है। सोरायसिस का मरीज़ों के जीवन पर पड़ने वाले असर की तुलना हार्ट फेल और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से की जा सकती है।

हाल में हुए अध्ययनों से पता चला है कि सोरायसिस में होने वाली यह जलन सिर्फ त्वचा और जोड़ों तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि यह पूरे शरीर में भी हो सकती है। इससे हृदय रोगों, डायबिटीज़, किडनी की बीमारियों और पेट में जलन जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। इस स्थिति के लिए किसी खास वजह की पहचान नहीं की जा सकी है, लेकिन इसके कई कारण हो सकते हैं: अनुवांशिक जोखिम, पर्यावरण से जुड़ी वजहें जैसे कि संक्रमण, मोटापा, तनाव, कई दवाएं और चोट। नए बायोलॉजिक्स के साथ आधुनिक उपचारों की मदद से तेज़ी से और पूरी तरह त्वचा को लंबी अवधि तक साफ रखने की उम्मीद पूरी हो जाती है।