विश्व कुष्ठ दिवस के मौके पर उद्योग जगत के प्रतिष्ठित लोग ‘डॉ. एस के नूरदीन: आर्किटेक्ट ऑफ द ग्लोबल लेप्रोसी एलिमिनेशन प्रोग्राम’ पुस्तक लॉन्च के लिए एकत्र हुए। इस पुस्तक को सासाकावा-इंडिया लेप्रोसी फाउंडेशन (एस-एलआईएफ) के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य डॉ. डेरेक लोबो ने लिखा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन भी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।
इस पुस्तक को लिखने के विचार पर डॉ. डेरेक लोबो ने कहा कि डॉ. एसके नूरदीन बहुत सरल व्यक्ति थे, जो सतत रूप से कुष्ठ उन्मूलन की दिशा में प्रयासरत रहे। वर्षों तक उन्होंने इस दिशा में अथक प्रयास किया और कई उपलब्धियां हासिल कीं, लेकिन कभी इस बारे में लिखने का विचार नहीं किया। उनके निधन के बाद डॉ. लोबो ने उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए यह पुस्तक लिखने का निर्णय लिया।
सासाकावा-इंडिया लेप्रोसी फाउंडेशन (एस-आईएलएफ) द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान दुनियाभर में कुष्ठ से प्रभावित लोगों की वर्तमान स्थिति के बारे में विमर्श भी हुआ। डॉ. लोबो ने आगे कहा, ‘वैश्विक स्तर पर कुष्ठ के 57 प्रतिशत मरीज भारत में हैं, जबकि 121 देशों में मिलाकर 40 प्रतिशत मरीज हैं। डब्ल्यूएचओ कुष्ठ उन्मूलन के लिए व्यापक प्रयास कर रहा है। 31 देशों में कुष्ठ के शून्य और 30 देशों में 10 से कम मामले पाए गए हैं। केवल ब्राजील, भारत और इंडोनेशिया में 10,000 से ज्यादा कुष्ठ के मामले मिले हैं।’
बीमारी के प्रति जागरूकता को लेकर बदलते परिवेश पर एस-आईएलएफ के चेयरमैन श्री तरुण दास से चर्चा करते हुए डॉ. स्वामीनाथन ने कहा,’कहा जाता है कि छोटा प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकता है। एक व्यक्ति भी यदि लगन से प्रयास करे तो बड़े बदलाव ला सकता है। डब्ल्यूएचओ आभारी है कि डॉ. नूरदीन ने सही समय पर कुष्ठ उन्मूलन के प्रयासों को दिशा दी। इस बीमारी के उन्मूलन के लिए इसके बारे में जानना जरूरी है। इसके बारे में जागरूकता की कमी इस बीमारी के उन्मूलन की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है। साथ ही फंडिंग और रिसर्च की कमी भी समस्या है। इस संक्रमण से जूझ रहे व्यक्ति के लिए परिस्थितियां बहुत मुश्किल होती हैं और छुआछूत से स्थिति और बदतर हो जाती है। हमें समझना होगा कि कुष्ठ संक्रामक नहीं है। कुष्ठ से संक्रमित व्यक्ति समाज में सामान्य तरीके से जीवन जी सकता है, इसमें कोई खतरा नहीं है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘छुआछूत के कारण कुष्ठ की जांच भी बड़ी चुनौती है। जल्दी जांच, अधिक जागरूकता और आधुनिक तरीकों से जांच के लिए स्वास्थ्यकर्मियों का कौशल विकास कुछ ऐसे कदम हैं, जो डब्ल्यूएचओ और कुष्ठ प्रभावित देश उठा रहे हैं। क्लीनिकल ट्रायल और रिचर्स में विकास के साथ-साथ हमें एस-एलआईएफ जैसे संस्थानों की आवश्यकता है, जो संक्रमितों के अधिकारों की आवाज उठा सकें। मैं इस प्रतिबद्धता के लिए सासाकावा फाउंडेशन को धन्यवाद करती हूं।’
कोविड-19 महामारी से पहले सालाना 2,00,000 से ज्यादा कुष्ठ के मामले सामने आ रहे थे। मल्टी ड्रग थेरेपी से कुष्ठ का इलाज किया जा सकता है, लेकिन इलाज न मिल पाए तो स्थायी अपंगता हो सकती है। एक अनुमान के मुताबिक 30 से 40 लाख लोग हैं, जो कुष्ठ के कारण किसी न किसी प्रकार की अपंगता का शिकार हैं। पूरी तरह ठीक हो सकने वाली बीमारी होने के बावजूद इस बारे में बहुत भ्रम और गलतफहमी व्याप्त है। दुनिया के कई हिस्सों में जो मरीज इलाज प्राप्त करके ठीक हो चुके हैं, उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को भी लगातार छुआछूत का सामना करना पड़ता है। इस भेदभाव के कारण उनके लिए शिक्षा, रोजगार एवं समाज में सहभागिता के अवसर कम हो जाते हैं।













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