नेत्रश्लेष्मलाशोथ (कंजंक्टिवाइटिस) का प्रकोप बढ़ रहा है और पिछले 2-3 हफ्तों में खासकर बच्चों में नेत्रश्लेष्मलाशोथ के मामले 70% बढ़े हैं जो मानसून से संबंधित बीमारियों के खतरे का संकेत देता है। सामाजिक दूरी बनाए रखने के उपायों में ढील, मास्क का उपयोग न करना और हाथ धोने जैसी सुरक्षा आदतों के अभाव के कारण भी इस संक्रमण में अचानक वृद्धि हुई है। नेत्रश्लेष्मलाशोथ, जिसे पिंक आई के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी बीमारी है जिसमें कंजंक्टिवा में सूजन आ जाती है। कंजंक्टिवा एक पतली पारदर्शी ऊतक है जो आंख के सफेद हिस्से के ऊपर होता है और पकलों की अंदरूनी परत बनाता है। हालाँकि यह नेत्र रोग हर किसी को हो सकता है, लेकिन बच्चे विशेष रूप से इसका शिकार बनते हैं। यह अत्यधिक संक्रामक हो सकता है, हालांकि, उचित सावधानियां बरतने और डॉक्टर की सलाह मानने से इसके प्रसार को रोका जा सकता है और कोई दीर्घकालिक समस्या भी नहीं होती है। डॉ. नीरज शाह – संकरा आई हॉस्पिटल, जयपुर में कैटरेक्ट, कॉर्निया एंड रिफ्रैक्टिव सर्विसेज केमुख्य चिकित्सा अधिकारीकहते हैं, यह संक्रमण मुख्य रूप से मौसम में बदलाव के कारण और बैक्टीरिया या वायरस के कारण होता है।
नेत्रश्लेष्मलाशोथ के लक्षण– पलकों में सूजन,आंख के सफेद हिस्से या पलकों का अंदरूनी हिस्सा लाल पड़ना,आंखों में खुजली और जलन होना, आंखों में किरकिरी होना।
नेत्रश्लेष्मलाशोथ से बचाव के उपाय–भीड़-भाड़ वाले और तंग जगहों पर जाने से बचें, सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी चीज़ को छूने से बचें, बार-बार हाथ धोएं और हैंड सैनिटाइज़र का उपयोग करें, अपने तकिए के गिलाफ बार-बार बदलें, आंखों के सौंदर्य प्रसाधन या आंखों की देखभाल की व्यक्तिगत वस्तुएं दूसरे के साथ साझा न करें।
यदि आपको नेत्रश्लेष्मलाशोथ है तो इन नुस्खों का पालन करें–यदि आपको कोई भी लक्षण हो तो नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श करें, ओवर-काउंटर दवा लेने या घरेलू उपचार करने से बचें, जब तक संक्रमण दूर न हो जाए, तब तक अपने तकिए का गिलाफ हर दिन धोएं या बदलें, अपनी संक्रमित आंख को अपनी उंगलियों से न छुएं या रगड़ें नहीं। अपनी आंखों को साफ करने के लिए आई वाइप्स का प्रयोग करें, अपनी आंख पर पैच न लगाएं। इससे संक्रमण और बिगड़ सकता है, आई ड्रॉप डालने के बाद या अपनी आंखों को छूने के बाद अपने हाथ धोएं।
यह गलत धारणा है कि नेत्रश्लेष्मलाशोथ से संक्रमित व्यक्ति को देखने से आप इस बीमारी की चपेट में आ जाएंगे। यह सच नहीं है, क्योंकि यह बीमारी केवल शरीर के संपर्क में आने और शारीरिक द्रवों के संपर्क में आने से ही फैलता है। डॉ. नीरज शाह – संकरा आई हॉस्पिटल, जयपुर में कैटरेक्ट, कॉर्निया एंड रिफ्रैक्टिव सर्विसेज केमुख्य चिकित्सा अधिकारीकहते हैं, अगर आप इस बारे में अनिश्चित हैं कि संक्रमण होने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं, तो डॉक्टर से परामर्श करना सही होगा।












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