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एबट ने वर्टिगो को लेकर शुरू की पहल

वर्टिगो एक बैलेंस डिसऑर्डर है जो आमतौर पर अंदरूनी कान की समस्याओं की वजह से होता है। इससे अचानक ही असहज-सा अनुभव होता है ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया घूम रही हो यह शरीर के वेस्टिवुलर सिस्टम में रुकावट पैदा कर देता है जोकि एक आंतरिक जीपीएस की तरह काम करता है और इसका काम होता है संतुलन बनाए रखना यह चक्कर बिना किसी चेतावनी के हो सकता है जिससे गिरने और फ्रैक्चर का डर रहता है वर्टिगो एक आम समस्या है और 10में से 1व्यक्ति कभी ना कभी जीवनकाल में इसका अनुभव जरूर करते हैं भारत में लगभग 0.71प्रतिशत लोगों में वर्टिगो की समस्या है जोकि 90लाख का आंकड़ा होता है 60साल से अधिक उम्र के लोगों में 30प्रतिशत और 85साल से अधिक उम्र के 50प्रतिशत से ज्यादा लोगों के प्रभावित होने के साथ यह ज्यादातर बुजुर्गों में देखने को मिलता है इसके अलावा महिलाओं को वर्टिगो की समस्या से प्रभावित होने का खतरा दो से तीन गुना ज्यादा है।

डॉ पराग शेठ क्षेत्रीय चिकित्सा निदेशक एबट इंडिया का कहना है वैसे वर्टिगो कमजोर कर देने वाली समस्या है जो किसी की जिंदगी को काफी प्रभावित कर सकती है लेकिन सही देखभाल से इसका प्रबंधन किया जा सकता है एबॅट में हम वर्टिगो को लेकर जागरूकता फैलाने और भरोसेमंद समाधान देने के लिये प्रतिबद्ध हैं इसलिए हम पढ़ने योग्य सामग्री उपलब्ध करा रहे है जिसमें वेस्टिवुलर एक्सरसाइज के वीडियो ट्यूटोरियल शामिल हैं, ताकि रोगी आत्मविश्वास के साथ आगे कदम बढ़ पाएं। वे अपना संतुलन दोबारा हासिल कर पाएं और जिंदगी को खुलकर, सेहतमंद तरीके से जी पाएं।”

डॉ रचित जैन, ईएनटी विशेषज्ञ, श्री सिद्धार्थ ईएनटी और एलर्जी क्लीनिक, जयपुर का कहना है, “वर्टिगो को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, ताकि लोग जल्द से जल्द मदद ले पाएं। यह खासकर काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अन्य बीमारियों के भी लक्षण हो सकते हैं, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है और गंभीर परिणाम हो सकते हैं और फ्रैक्चर या गिरने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। एक्सरसाइज-आधारित और चिकित्सकीय उपचार करवाने से, उनकी जीवनशैली को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।”

वर्टिगो के साथ घर के अंदर चलना-फिरना, ग्रॉसरी शॉपिंग, काम के लिये बाहर जाना, जैसे रोजमर्रा के काम मुश्किल हो जाते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति के अंदर घर में बंद रहने की इच्छा, सामाजिक मेल-मिलाप पर दुष्प्रभाव डालती है, जिससे आत्मनिर्भरता खत्म हो जाती है और एंजाइटी तथा डिप्रेशन जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव होते हैं खासकर महिलाओं में यह दुष्चक्र पैदा करता है जिससे एंजाइटी बढ़ जाती है और स्ट्रेस हॉर्माेन- कोर्टिसोल के बढ़ने से वर्टिगो ट्रिगर होता है। यह किसी की कामकाजी जिंदगी को प्रभावित कर सकता है, जिसकी वजह से नौकरी बदलने या छोड़ने की नौबत आ जाती है, क्षमता कम हो जाती है और काम करने के दिन का नुकसान होता है इसकी वजह से अंतत आर्थिक रूप से लोग प्रभावित होते हैं।

बड़े पैमाने पर इस समस्या के होने के बावजूद, इसको लेकर जागरूकता की कमी है। लोग इस तरह की रोजमर्रा की समस्याओं को आम चक्कर मानकर अक्सर नजरअंदाज करते हैं, जिसकी वजह से प्राथमिक चिकित्सा स्तर पर इसकी पहचान कर पाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इसके लक्षणों को बता पाना और उन्हें मानकीकृत कर पाना मुश्किल होता है। इतना ही नहीं, वर्टिगो की पहचान कर पाना मुश्किल होता है, क्योंकि मितली और उल्टी जैसे लक्षणों को बाकी समस्याओं से अलग कर पाना कठिन होता है। अच्छी बात ये है कि वर्टिगो को फिजिकल थैरेपी, आहार संबंधी बदलावों और जीवनशैली में सुधार, दवाओं, फिजियोथैरेपी या कुछ मामलों में सर्जरी से भी ठीक किया जा सकता है। इसमें वेस्टिवुलर रिहैबिलिएशन एक्सरसाइज शामिल है, जिसे डॉक्टर की सलाह पर अलग-अलग मामलों के अनुरूप तय किया जाता है। इसलिए, समय पूर्व इसकी पहचान और प्रभावी उपचार विकल्पों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।

जीवनशैली में बदलाव लाकर लक्षणों में सुधार लाया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही कई लोग वर्टिगो के बताए गए उपचार का पालन नहीं करते। अटैक की संख्या और गंभीरता को कम करने के लिये समय पर दवाएं लेना और डॉक्टर की सलाह मानना भी बहुत जरूरी है। इससे लोगों को अपने वर्टिगो को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है, ठीक होने के उनके रास्ते में उनका सहयोग कर सकती है।